महाभारत में एक प्रकरण आता है कि युद्ध के पश्चात् महाराज युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञं आयोजित किया जिसमे भारत के सभी राजा ऐवम संत, ऋषि मुनि गण पधारे थे l
एक दिन महाराज युधिष्ठिर ने लक्ष किया कि एक विलक्षण नेवला, जिसका आधा शरीर सामान्य ऐवम आधा शरीर स्वर्णिम था, प्रतिदिन आ कर जहाँ साधु संत ऋषि मुनि विराजमान होते हैं – वहां की भूमि में लोट पोट होता है ऐवम फिर चला जाता है l
महाराज युधिष्ठिर ने नेवले के अथक परिश्रम ऐवम वापस जाने के समय निराशा का भाव देख कर उससे निवेदन किया कि यदि नेवले ने अपनी समस्या का वर्णन किया तो वे उसका समाधान करने का प्रयत्न करेंगे l
तब नेवले ने उत्तर दिया कि हे राजन आप चक्रवर्ती सम्राट हैं l
आपके इस यज्ञं में दिग्दिगंत से महान तपस्वी ऋषि मुनि संत महात्मा पधारें हैं ऐवम मेरे उनकी चरण रज में लोटने का प्रयोजन अपने बाकी के शरीर को भी स्वर्णिम बनाना है l
परन्तु मैं अब अत्यंत निराश हो कर जा रहा हूँ कि इतने महान आत्माओं की चरण रज भी मेरे बाकी के शरीर को स्वर्णिम बनाने में असफल रहीं l
महाराज युधिष्ठिर ने घोर आश्चर्य के साथ जिज्ञासा प्रकट की कि हे नेवले कृपया विस्तारपूर्वक बताएं आपका यह आधा शरीर कैसे स्वर्णिम हो गया l
नेवले ने कहा कि हे राजन, अनेक वर्ष पहले मैं एक निर्धन ब्राह्मण के घर के पास रहता था l
वह निर्धन ब्राह्मण अन्न के लिए बाहर गया हुआ था ऐवम उसका परिवार २ दिनों से भूखा था l
जब वह कुछ अन्न लेकर लौटा और उसे पीस कर रोटी बनायीं उसी समय एक भूखा अतिथि आ गया l
उस ब्राह्मण परिवार ने अपनी २ दिनों कि भूख को सहर्ष दुर्लक्ष्य कर के उन रोटियों को उस भूखे अतिथि के खिला कर विदा किया ऐवम भूखा ही सो गया l
मैं भी क्षुधा पीड़ित था अतः कुछ बची हुई रोटी के टुकड़ों की आशा से उसके घर के अन्दर प्रविष्ट हुआ l
कुछ खाने तो नहीं मिला परन्तु जहाँ रोटियां बनी थीं वहां की भूमि पर गिरे हुए आटे के कणों से मेरे शरीर का कुछ भाग स्वर्णिम हो गया l
हे राजन, आपके इस अश्वमेघ यज्ञं में प्रतिदिन आ कर महान तपस्वी ऋषि मुनि संत महात्मा जनों की चरण रज में लोटने का प्रयोजन केवल मेरे बाकी के आधे शरीर को भी स्वर्णिम करना था परन्तु मैंने देख लिया है कि किसी भी महान तपस्वी ऋषि मुनि संत महात्मा कि चरण रज में वह शक्ति नहीं है जो उस निर्धन ब्राह्मण के त्याग में थी कि उसकी रोटी के गिरे हुए आटे से भी मेरा शरीर स्वर्णिम हो गया l
हे राजन, उस निर्धन ब्राह्मण का त्याग देखने में भले ही साधारण मनुष्य को नगण्य प्रतीत हो परन्तु आप के यज्ञं में पधारे समस्त महात्मा भी उस के त्याग की बराबरी नहीं कर सकते हैं l
महाभारत का यह प्रकरण नगण्य के महात्म्य को दर्शित करता है l
हम सब भारतवासी रामायण ऐवम महाभारत के दृष्टान्तों से शिक्षा ले कर यदि अपने जीवन में "सूक्ष्म की शक्ति" ऐवम "नगण्य के महात्म्य" को आत्मसात कर लें तो अनेकानेक कष्टों से त्वरित मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं l




