"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

एक चिट्ठी रामदेव जी के नाम.


हेस्वामीरामदेवजीतथाउनकेजैसीसोचरखनेवालोंआपसब !

ध्यानसेसुनिए……………..

हैं खड़े हिंस्र वृक-व्याघ्र, खड़ा पशुबल है;

ऊँची मनुष्यता का पथ नहीं सरल है.

ये हिंस्र साधु पर भी न तरस खाते हैं,

कंठी-माला के सहित चबा जाते हैं !

जो वीर काट के इन्हें पार जाएगा,

उत्तुंग शिखर पर वही पहुँच पायेगा !

हैं दु:खी मेष, क्यों लहू शेर चखते हैं,

नाहक इतने क्यों दाँत तेज रखते हैं.

पर शेर द्रवित हो दशन तोड़ क्यों लेंगे ?

मेषों के लिए व्याघ्रता छोड़ क्यों देंगे ?

एक ही पंथ, तुम भी आघात हनो रे !

मेषत्व छोड़ मेषों ! तुम व्याघ्र बनो रे !

एक ही पंथ अब भी जग में जीने का,

अभ्यास करों छागियों ! रक्त पीने का !

………………

शुरू हो गया भैंस-भैंस का खेल, जानवर तू भी बन ले ;

पशु की तरह डकार, यही बन की भाषा है.

सिर पर तीखे सींग बँध, बघनखे पहन ले.

सकुचा रहा ?

क्या बर्बरता का खेल, नहीं खुल कर खेलेगा ?

तोड़ेगा सिर नहीं विकट, विषधर भुजंग का ?

भैंसों की हुरपेट पीठ पर ही झेलेगा ?

तो कहता हूँ, सुन रहस्य की बात,

खड्ग सींचा जाता है—-

नहीं युद्ध में गंगा के जल की फुहार से.

अज़ब बात तू लड़े आततायी असुरों से

निर्ममता से नहीं,

दया, ममता, दुलार से !

जहाँ शस्त्र-बल नहीं, शास्त्र पछताते या रोते हैं.

ऋषियों को भी सिद्धि तभी तप से मिलती है,

जब पहरे पर स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं !

………….

नेता निमग्न दिन-रात शांति-चिंतन में,

कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में.

यज्ञाग्नि हिंद में समिध नहीं पाती है,

पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है.

ओ बदनसीब अंधों ! कमजोर अभागों ?

अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो.

वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,

जिसकी ज्वाला बुझ गई, वही पापी है.

तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,

लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है.

असि छोड़, भीरू बन जहाँ धर्म सोता है,

पातक प्रचंडतम वहीं प्रकट होता है.

……..

पहली आहुति है अभी, यज्ञ चलने दो,

दो हवा, देश की आग जरा जलने दो.

जब ह्रदय-ह्रदय पावक से भर जाएगा,

भारत का पूरा पाप उतर जाएगा.

देखोगे, कैसा प्रलय चण्ड होता है !

असिवन्त हिन्द कितना प्रचण्ड होता है !

जो असुर, हमें सुर समझ, आज हँसते हैं,

वंचक श्रृगाल भूँकते, साँप डसते हैं,

कल यही कृपा के लिए हाथ जोड़ेंगे,

भृकुटी विलोक, दुष्टता-द्वंद्व छोड़ेंगे !

….

युग-युग से जो ऋद्धियाँ यहाँ उतरी हैं,

सिद्धियाँ धर्म की जो भी छिपी, धरी हैं,

उन सभी पावकों से प्रचण्डतम रण दो,

शर और शाप, दोनों को आमंत्रण दो !

चिंतकों ! चिन्तना की तलवार गढ़ो रे !

ऋषियों ! कृशानु- उद्दीपन मन्त्र पढ़ो रे !

योगियों ! जगो, जीवन की ओर बढ़ो रे !

बंदूकों पर अपना आलोक मढ़ो रे !

है जहाँ कहीं भी तेज, हमें पाना है,

रण मे समग्र भारत को ले जाना है !

पर्वतपति को आमूल डोलना होगा,

शंकर को ध्वंसक नयन खोलना होगा.

असि पर अशोक को मुण्ड तोलना होगा,

गौतम को जयजयकार बोलना होगा.

यह नहीं शान्ति की गुफा, युद्ध है, रण है,

तप नहीं, आज केवल तलवार शरण है !

ललकार रहा भारत को स्वयं मरण है,

हम जीतेंगे यह समर हमारा प्रण है !

[ उपरोक पंक्तियों की रचना कर भारतवर्ष को सन्नद्ध करने के लिए राष्ट्रकवि दिनकर को प्रणाम है.]

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s