"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

एक घटना जो बौद्ध दर्शन के भारत से सफाए का का रण बन गयी


हिन्दू धर्म, जिसका एक नाम सनातन धर्म भी हँ अर्थात जिसका कभी अंत नहीं होता इतिहास में भी हम देखते हँ की जब जब काल के प्रभाव से ये धर्म लडखडाता हँ तभी कोई न कोई संत महात्मा अवतार लेकर इस धर्म को उबार लेता हँ और आने वाले समय के लिए भी मजबूती प्रदान कर देता हँ इसी कारण जब भारत में मुसलमान शासको की बर्बरता अपने चरम पर थी उस समय भी तुलसीदास , सूरदास , मीरा , नानक , कबीर , तुकाराम जैसे अनेको संत एक ही समय पर पैदा हुए और धर्म की रक्षा की , उस समय को हिंदी साहित्य में इन्ही संतो के कारण ” भक्ति काल ” के नाम से जाना जाता हँ बौद्ध आये और गए , मुग़ल आये और गए , पुर्तगाली आये और गए , अंग्रेज आये और गए , लेकिन अगर कोई नहीं गया तो वो ये हिन्दू धर्म ही हँ , ये धर्म आज भी वही हँ ,बाकी सभी विचारधाराए इस कभी न अंत होने वाले धर्म में समा गयी और यही इस धर्म की महानता हँ!

शंकराचार्य , भारत के एक महान संत , हिन्दू धर्म के महानायक और आदि जगद्गुरु , शंकराचार्य , एक नाम जो आगे चलकर उपाधि ही बन गया कदाचित अगर शंकराचार्य ने जन्म नहीं लिया होता तो यह भारत भूमि काफी पहले ही इस्लामी मुल्क में तब्दील हो गयी होती , क्योकि अहिंसावादी और खोखले बौद्धों में इतनी ताकत न होती जो बर्बर मुस्लिम आक्रांताओ का सामना कर पाते लेकिन इस प्रसंग में एक विद्वान् को भी याद करना जरुरी हँ

भारत में हर इतिहास का जानकर आदमी ये तो जनता हँ की आदि जगदगुरु शंकराचार्य ने भारत से बौद्ध धर्म का सफाया किया लेकिन ये कम लोग ही ये बात जानते हँ की बौद्धों के खिलाफ अभियान की शुरुआत शंकराचार्य ने नहीं बल्कि कुमारिल भट्ट नाम के एक विद्वान् ने की थी जिन दिनों शंकराचार्य की अलोकिक प्रतिभा सारे देश में गूँज रही थी और वेह गुरु के आदेश से ११-१२ वर्षीय शंकराचार्य वेदांत सूत्र पर अपना विश्वविख्यात ” शारीरक भाष्य ” लिखने के लिए एकांत स्थान की खोज में हिमालय की गुप्त कंदराओ में जाने पर विचार कर रहे थे उन्ही दिनों कुमारिल भट्ट नाम के एक वयोवृद्ध विद्वान् बौद्धों के खिलाफ बिगुल फूंक चुके थे और उन्हें उत्तर भारत से बौद्ध धर्म और जैन दर्शन का सफाया कर दिया था ( विशेषकर जेनियो से हुए उनके शास्त्रार्थ तो सर्वथा अलोकिक होते थे ) उन दिनों एक ऐसी घटना घट गयी थी जिसने अनायास ही कुमारिल भट्ट को हिन्दुओ का नायक बना दिया था कुमारिल भट्ट एक बहुत उच्च स्तरीय विद्वान् थे और न्याय शास्त्र के ऊपर लिखे उनके ग्रन्थ आज भी विद्वानों को अत्यधिक प्रिय हँ कुमारिल भट्ट भारत में बौद्धों के बढ़ते पाखंड से बहुत चिंतित थे बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उन्होंने बौद्धों से शास्त्रार्थ करने की ठानी लेकिन बौद्ध दर्शन के सिद्धांतो से अवगत हुए बिना ये संभव नहीं था उन्होंने युक्ति से काम लेते हुए एक बौद्ध भिक्षु को शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया और ये शर्त राखी की जो हार जायेगा वो दुसरे का धर्म स्वीकार करेगा फिर वे जानबूझकर उससे हार गए , फिर पहले तय हुई शर्त के मुताबिक़ उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और नालंदा के बौद्ध विहार में आकर धरमपाल नाम के एक प्रख्यात बौद्ध आचार्य से बौद्ध न्यायशास्त्र का अध्यन करने लगे एक दिन उपदेश देते समय आचार्य धरमपाल ने कुमारिल भट्ट आदि शिष्यों के सामने वेदों की निंदा की जिसे सुनकर कुमारिल भट्ट को बड़ा दुःख हुआ वेह सर झुकाकर नीचे देखने लगे और वेदों के प्रति अगाध श्रद्धा के कारण उनके आंसू निकलने लगे पास के बौद्ध भिक्षुओ ने कुमारिल को रोते देखकर कारण पूछा , कुमारिल ने रोते हुए कहा – ” आचार्य वृथा ही वेदों की निंदा कर रहे हँ , उससे मुझे बड़ा कष्ट हो रहा हँ बौद्ध श्रमणों के द्वारा आचार्य को ज्ञात कराते ही उन्होंने कुमारिल से पूंछा – ”तुम रोते क्यों हो ? क्या तुम अभी भी वैद विश्वासी प्रछन्न हिन्दू हो ? बौद्ध श्रमण बनकर क्या तुम हमे प्रताड़ित करने आये हो ?

कुमारिल ने विनीत भाव से कहा – ” आप बिना वैद को समझे अकारण ही वेदों की निंदा कर रहे हँ ”

बौद्ध आचार्य ने उत्तेजित कंठ से कहा – ” तो तुम मेरे कथन की असत्यता प्रमाणित करो ”

तब आचार्य और कुमारिल में शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ ! कुमारिल एक अत्यंत विद्वान पुरुष थे, उन्होंने वैद के प्राधान्य के प्रतिपादन में कटिबद्ध होकर जटिल तर्कजाल से आचार्य को जर्जरित करते हुए कहा – ”जीव अल्पज्ञ और मायिक दोषों से युक्त हँ और ब्रह्म सर्वागी और माया का स्वामी हँ , सर्वज्ञ की कृपा के बिना जीव सर्वज्ञ नहीं हो सकता , महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के लिए वैदिक धर्म मार्ग का ही आश्रय लिया ,वेदों में जैसा वर्णन किया गया हँ वैसे ही साधना की , वेदों में वर्णित भगवान् को ही लक्ष्य कर अपनी साधना का फल उनसे चाहा फिर उन्ही की कृपा से ज्ञान प्राप्त किया फिर वेद ज्ञान से ही ज्ञानी होकर वेद को ही अस्वीकार कर दिया, यह चोरी नहीं तो और क्या हँ ? ”’

कुमारिल के कठोर मंतव्य से क्षुब्ध होकर बौद्ध आचार्य ने कहा -” तुम भगवान् बुद्ध की निंदा करते हो ? इस अत्यंत ऊंचे महल से गिराकर तुम्हारा प्राण संहार करना ही इस पाप का एकमात्र प्रायश्चित हँ आचार्य का इशारा पाकर अहिंसा ही जिसकी बुनियाद हँ, ऐसे उस बौद्ध धर्म के मानने वालो बौद्ध भिक्षुओ ने जो की इस समय काफी उत्तेजित थे, कुमारिल को पकड़ लिया और छत से नीचे फेंक दिया!

कुमारिल वैद विहित सभी साधनाए पूर्ण कर चुके थे और कई सिद्धियों के स्वामी थे , वे योग मार्ग में काफी आगे तक पहुचे हुए थे उन्होंने पहले ही अपनी आत्मा को अपने ब्रह्मस्वरूप में आरुढ़ किया तो जोर से कहा -” अगर वेद सत्य हँ तो मेरी भी मृत्यु नहीं होगी ” कुमारिल इतनी ऊँचाई से गिरकर भी सुरक्षित बच गए , ये देखकर बौद्ध भिक्षुओ को बड़ा आश्चर्य हुआ उधर हिन्दू लोग इस समाचार को सुनकर जोरदार कोलाहल करते हुए बौद्ध विहार में घुस गए और अत्यंत जोर से कोलाहल करते हुए कुमारिल को बौद्ध विहार से बहार ले आये इतनी ऊंचाई से गिराए जाने पर भी कुमारिल के जीवित बचे रहने को हिन्दुओ ने अपनी जय मान ली लेकिन इस एक घटना से हिन्दुओ और बौद्धों के बीच में एक महान विरोध का सूत्रपात हुआ और इसी एक घटना ने आगे चलकर भारत से बौद्ध दर्शन के सफाए को सुनिश्चित किया

जिस बौद्ध दर्शन को अहिंसावादी मानकर हिन्दू लोग उसकी तरफ से आँखे मूंदे बेठे थे , इस एक घटना ने सभी हिन्दुओ की आँखे खोल दी , जहा जहा जो जो हिन्दू इस घटना को सुनता था , बौद्धों के प्रति क्रोध से भर उठता था इससे हिन्दुओ और बौद्धों के मध्य काफी तनाव फेल गया था और उनके मध्य सशस्त्र संघर्ष के हालत पैदा हो गए थे इस एक घटना ने जर्जर और शिथिल पड़े हिन्दू धर्म में फिर से प्राणों का संचार कर दिया और हिन्दू धर्म ने अपनी अवश्यम्भावी वापसी के लिए फिर से अंगडाई ली

लेकिन उन दिनों भारत बहुत से छोटे छोटे राज्यों में बंटा हुआ था और अधिकांश राजसत्ता बौद्धों के ही पास थी तब हिन्दुओ ने बहुत गहन विचार विमर्श के बाद कुमारिल भट्ट को सामने कर एक विशाल विचारसभा में शास्त्रार्थ करने के लिए धरमपाल को बुलाया ! प्रण यह रहा की जो हारेगा वो जीतने वाले का धर्म स्वीकार करेगा या फिर तुषानल (भूसे के ढेर में आग लगाकर) में प्रवेशपूर्वक प्राण त्याग करेगा इधर बौद्धों की गुप्त सभा हुई और उसमे धरमपाल ने सभी के सामने यह प्राण किया की अगर वह भट्ट से हार जाता हँ तो वेह धर्म की खातिर अपना बलिदान दे देगा लेकिन हिन्दू धर्म स्वीकार नहीं करेगा भारत के सभी प्रान्तों से बौद्ध भिक्षु और हिन्दू विद्वान् इस विचारसभा के लिए प्रस्तुत हो मगध में समवेत होने लगे कुमारिल भट्ट की प्रतिभा के सामने बौद्धविद्वान हीनप्रभ हो गए, विशेष प्रयत्न करने पर भी आचार्य धर्मपाल ही पराजित हुए कुमारिल ने अकाट्य तर्क देकर हिन्दू शास्त्रों से बौद्ध शास्त्रों को गलत साबित कर दिया और बौद्ध को एक चोर, नकलची और असत्य भाषण करने वाला साबित कर दिया!

आचार्य धर्मपाल हार गए थे लेकिन फिर भी उन्होंने हिन्दू धर्म ग्रहण नहीं किया, कहा -”मेरी पराजय का कारण कुमारिल की प्रतिभा हँ , किन्तु बौद्ध धर्म में मेरी श्रद्धा नष्ट नहीं हुई हँ ,में बुद्ध धर्म की शरणागति से विचलित नहीं हुआ हु , में हिन्दू धर्म में आने की बजाय प्राण त्यागना पसंद करूँगा धर्मपाल पहले से तय हुई शर्त के अनुसार तुषानल में प्रविष्ट हुए!

कुमारिल की इस विजय से हिन्दुओ के हर्ष का ठिकाना नहीं था हिन्दुओ ने कुमारिल को कंधे पर उठाकर जय घोष करना शुरू कर दिया और संध्या काल में कुमारिल को रथ में बिठाकर बड़ी धूमधाम से बड़े जोर शोर से हिन्दू धर्म की जय जय कार करते हुए सारे नगर में रथ से चक्कर लगाया कुमारिल की इस विजय ने समस्त भारत के लोगो में वैदिक धर्म के नव जागरण की सृष्टि की उस समय के मगधराज ( वर्तमान में बिहार ) आदित्यसेन ने बौद्धों पर हिन्दुओ की विजय को गौरवान्वित करने के लिए एक विशेष ठाठबाट से कुमारिल भट्ट को प्रधान पुरोहित रख लिया और उनसे सलाह करके अपने राज्य में जीर्ण पड़े मंदिरों का पुनरुद्धार किया , नगर नगर धार्मिक आयोजन करने की आज्ञा दी और पश्चात विशाल भंडारे को अनिवार्य करवाया!

गोड देश ( वर्तमान में बंगाल ) के हिन्दू राजा शशांक नरेन्द्र वर्धन ने हिन्दुओ के उत्साह को और बढाते हुए बौद्ध गया में आकर , जिस बोधिवृक्ष के नीचे बैठकर महात्मा बुद्ध ने सिद्धि प्राप्त की थी और जो बौद्धों के लिए सर्वाधिक पवित्र तीर्थ स्थल था उस बोधिद्रुम को काट डाला और बोद्ध मंदिर पर अधिकार स्थापित करते हुए महात्मा बुद्ध की मूर्ति के चारो और दीवाल खड़ी करते हुए बंद कर दिया , इतना ही नहीं उन्होंने तीन बार उस वृक्ष के मूल को खोदकर उसे समूल नष्ट कर दिया था!

कुमारिल भट्ट ने भी अनेक शास्त्रार्थो में अकाट्य तर्कों से उत्तर भारत में बौद्ध और जैन धर्म के प्राधान्य को नष्ट कर दिया था बौद्ध आचार्य धरमपाल की पराजय और उनके हश्र के अनंतर और कोई कुमारिल भट्ट से शास्त्रार्थ करने नहीं आते थे लेकिन बाद में बौद्धों ने राजशक्ति की मदद से फिर से उत्तर भारत में अपनी स्थति मजबूत कर ली थी जिसे कालांतर में महान अद्वेताचार्य आदि जगदगुरु शंकराचार्य ने जड़ से समूल नष्ट किया!

शंकराचार्य 16 बरस की उम्र से हिन्दू धर्म के मूल स्वरुप को पुनः प्रकट करने हेतु वैदिक साहित्य पर अपना लेखन कार्य समाप्त कर चुके थे और अपनी गुरु परंपरा के समाख अपना शरीर छोड़कर सदा के लिए ब्रह्मा में लीं होकर ब्रह्मानंद का भोग करना चाहते थे लेकिन गुरु परंपरा के आदेश पर सारे भारत में हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना के इस विशाल और दुष्कर कार्य को उन्होंने स्वीकार किया और अपनी ३२ वर्ष की आयु तक उन्होंने भारत से बौद्ध दर्शन का पूरी तरह विध्वंश कर दिया था इस दोरान वे विदेशो में नेपाल , भूटान , तिब्बत आदि भी गए आचार्य ने हिमालय से आकर उन्होंने सबसे पहला काम ये ही किया था की कुमारिल भट्ट को शास्त्रार्थ में परास्त करके उन्हें अद्वेत्वादी बनाकर अपने साथ भारत भ्रमण के लिए उन्हें लेने प्रयाग आये थे! बौद्ध धर्म को भारत से जड़ से समाप्त करने का श्रेय भले ही शंकर की अलोकिक प्रतिभा को जाता हो लेकिन बौद्धों के खिलाफ बिगुल फूंकने का श्रेय कुमारिल भट्ट को ही जाता हँ

2 responses

  1. roopali

    jis dharm ko nast karne itna hinsak usi ke vajah se aaj bharat ki pehchan hai

    February 24, 2014 at 9:39 PM

  2. allahuakbar

    IS SE SABIT HOTA HAI KI HINDU EK HINSAK AUR HARAMI DHARM HAI.JAKAR GAYA ME DEKHO WAHA TREE LAGAYA JA RAHA HAI

    August 6, 2012 at 12:18 PM

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