"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

दक्षिण एशिया में सिकुड़ते हिंदू


एक समय था, जब संपूर्ण पूर्वी एशिया पर 700 वर्षों से अधिक लंबे कालखंड तक हिंदू सम्राटों ने एकछत्र राज्य किया था। आज उन्हीं हिंदुओं के उत्तराधिकारी दक्षिण एशिया में अमानुषिक दमन, अत्याचार तथा पलायन के शिकार बन रहे हैं। पाकिस्तान में आजादी के समय 13 प्रतिशत हिंदू्-सिख जनसंख्या थी, आज वह एक प्रतिशत से भी कम है। विभाजन के समय नेहरू-लियाकत पैक्ट में पाकिस्तान में हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी की बात हुई थी।

मुहम्मद अली जिन्ना ने भी पाकिस्तान की संविधान सभा में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के बारे में लंबे-चौड़े आश्वासन दिए थे, लेकिन समय के साथ वहां के हिंदू-सिख भीषण अत्याचारों के शिकार होते आ रहे हैं। यहां तक कि वहां के गुरुद्वारे पाकिस्तान वक्फ बोर्ड की व्यवस्था के अंतर्गत रखे गए, जिनके अधिकारी मुसलिम होते हैं। पाकिस्तान की किसी पाठ्यपुस्तक में महाराजा रणजीत सिंह के राज के बारे में एक शब्द भी नहीं पढ़ाया जाता, जबकि उनकी राजधानी लाहौर थी। लाहौर को भगवान रामचंद्र के बेटे लव ने बसाया, यह बात पाकिस्तान के पर्यटन विभाग के साहित्य में अभी तक कही जाती रही है, लेकिन कहीं भी लव के बारे में कुछ पढ़ाया नहीं जाता। बल्कि लव के अनुयायी जबरन धर्मांतरण और अपहरण के शिकार बनाए जा रहे हैं।

बलूचिस्तान स्थित विश्व प्रसिद्ध माता हिंगलाज शक्तिपीठ के महंत का अपहरण हुए एक महीना हो गया है, लेकिन अभी तक उनका कोई समाचार नहीं मिला। खासकर सिंध क्षेत्र से हर महीने दस से बारह हिंदू युवतियों के अपहरण और जबरन धर्मांतरण के बाद निकाह के समाचार आते हैं। जब लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान गए थे, तो महाभारतकालीन कटास राजमंदिर के पुनर्निर्माण के लिए पाकिस्तान सरकार ने वायदा किया था और दस करोड़ रुपये अनुदान की घोषणा की थी। इस सिलसिले में आज तक थोड़ा भी काम नहीं हुआ है। कराची के शिव मंदिर में हिंदू पुजारियों को अर्द्धचंद्राकार मुसलिम टोपी पहने पूजा कराते देखा गया । उन्होंने बताया कि सुरक्षा के लिए ऐसा करना ही पड़ता है।

भूटान से एक लाख से अधिक उन हिंदुओं को निकाल दिया गया, जो कई पीढ़ियों से भूटान में जन्मे, पले-बढ़े और वहां के नागरिक थे। हमारी सरकार ने भी उनका साथ नहीं दिया, बल्कि ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी ने उन्हें बतौर शरणार्थी अपने यहां शरण दी।

नेपाल में हिंदू राष्ट्र का सांविधानिक दरजा केवल भावनात्मक था। वहां मुसलिमों को भी वही अधिकार थे, जो हिंदुओं को मिले। लेकिन हिंदू शब्द से नफरत करने वाले सेक्यूलरवाद की हवा और वामपंथी प्रभाव में वहां का न केवल हिंदू राष्ट्र वाला दरजा खत्म किया गया, बल्कि पचास हजार से अधिक ऐसे स्वयंसेवी संगठन खुले, जो बहुत बड़े पैमाने पर नेपाल की गरीब और भोली-भाली जनता के बीच धर्मांतरण तथा भारत-विरोधी भावना फैलाने का काम कर रहे हैं।

वर्ष 1947 में बांग्लादेश में 30 प्रतिशत हिंदू जनसंख्या थी। 1991 की जनसंख्या के अनुसार वहां से दो करोड़ हिंदू ‘गायब’ पाए गए। आज वहां केवल 10 प्रतिशत हिंदू जनसंख्या है। वहां शत्रु संपत्ति जब्त करने का शासकीय हथियार बन गया है और बचे-खुचे हिंदुओं की 44 प्रतिशत जनसंख्या इस अधिनियम के कारण पूरी या कुछ संपत्ति गंवा चुकी है। भारत मित्र कही जाने वाली अवामी लीग की शेख हसीना के शासन के बावजूद मंदिरों पर हमले और हिंदू युवतियों के अपहरण की घटनाएं बढ़ी ही हैं। बांग्लादेश को इसलामी गणतंत्र घोषित करने के बाद हिंदुओं की आवाज और दब गई है।

सब देशों से दोस्ती हो और कोई किसी के आंतरिक मामले में दखल न दे, यह बात सब मानते हैं, लेकिन यदि हमारी सरकार फलस्तीन, मालदीव और श्रीलंका के मानवाधिकारों पर राष्ट्र संघ में आवाज उठाते हुए उन देशों में अपने राजकीय प्रतिनिधिमंडल भेजकर समाधान का प्रयास करता है, तो केवल हिंदुओं के बारे में शासन और राजनीतिक पार्टियों द्वारा सन्नाटा ओढ़ लेना क्या न्यायोचित है?

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