"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

स्वामी दयानन्द सरस्वती


17 फ़रवरी स्वामी दयानन्द सरस्वती की जयंती पर उनको सत सत नमन !!

"काम करने से पहले सोचना बुद्धिमानी ,काम करते हुए सोचना सतर्कता और काम करने के बाद सोचना मुर्खता है" — स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने जो शिक्षा दी स्वयं भी उसका पालन किया। सन 1875 में आर्य समाज की स्थापना कर देश और दुनिया को नयी दिशा प्रदान किया, दयानंद जी के जीवन का अनुसरण करके जीवन को उन्नति के सोपान पर ले जा सकते हैं। महर्षि दयानंद चारों वेदों के ज्ञाता तो थे ही, वेदांग और शास्त्रों के भी प्रकांड विद्वान थे। आयुर्वेद में बताए गए जीवन-सूत्रों का उन्होंने स्वयं पालन किया। भोर में उठ जाना, जल पीना, शौच जाना, घूमना, आसन, प्राणायाम, ध्यान करना, फिर स्वाध्याय और सात बजे तक नाश्ता लेकर जनहित के कायरें में लग जाना। यही थी उनकी दिनचर्या। वे दिन भर कठिन मेहनत करते, यहां तक कि भोजन की चिंता तक उन्हें नहीं रहती। वे शाकाहार ही करते। उनका कहना था कि शाकाहार में अपरिमित शक्ति है। महर्षि की दिनचर्या देखकर लोगों को हैरानी होती थी, क्योंकि वे हमेशा कार्यो में व्यस्त रहते थे।

एक घटना है। महर्षि दयानंद के पास एक व्यक्ति आया और बोला-स्वामी जी, मैं क्या करूं, जिससे सुखी हो जाऊं। दयानंद कुछ पल रुककर बोले, हर कार्य को मन लगाकर पूरी शक्ति से करो, तो निश्चित ही सुखी हो जाओगे। उस व्यक्ति ने वैसा ही किया और सुखी हो गया।

महर्षि कहते थे कि इंसान तभी समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकता है, जब उसका शरीर पूर्णत: स्वस्थ हो। शरीर से कमजोर व्यक्ति का मन भी उसके काबू में नहीं होता, तो वह परोपकार के कार्य कैसे कर सकता है। महर्षि दयानंद ने समाज, देश, संस्कृति और धर्म की उन्नति के लिए अनेक कार्य किए। उन्होंने ईश्वर की प्रार्थना पर बल दिया, क्योंकि इससे मन को केंद्रित करने का अभ्यास होता है और हर कार्य को मनोयोग से कर पाने का आत्मविश्वास आता है। उन्होंने यह भी कहा कि घर आए मेहमान को खिलाने के बाद ही खाना चाहिए। माता-पिता या अपने बड़ों की सेवा और खाने के पहले आश्रितों को भोजन कराना वे आवश्यक मानते थे और इनका पालन करते थे। उन्होंने सत्य के साथ-साथ प्रेम, करुणा, दया, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अभय, सत्साहस, अपरिग्रह, त्याग, परोपकार, न्याय, सदाशयता, सहिष्णुता, धर्म और अन्य सद्गुणों को जीवन का अहम हिस्सा बनाकर बता दिया कि इनके पालन से मनुष्य कितनी उन्नति कर सकता है। इसलिए गांधीजी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, लाला लाजपतराय सहित सभी महान हस्तियों ने उन्हें उस युग का सर्वश्रेष्ठ मानव कहकर अभिनंदन किया।

वे सत्यार्थ प्रकाश में कहते हैं-कोई कार्य दूसरों के कहने से नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि से करना चाहिए। उनका मानना था कि लालच, लोभ और छल-कपट से इंसान कभी उन्नति नहीं कर सकता। महर्षि का प्रेरक जीवन आज भी हमारे लिए मील के पत्थर की तरह है।

जय जय माँ भारती

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