"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

सलमान खुर्शीद और लुई खुर्शीद के जाकिर हुस ैन ट्रस्ट में 71 लाख रुपए का बंदरबांट हुआ


नेता अकसर खुद को समाजसेवी बताते हैं. अगर वो जनप्रतिनिधि चुन लिए गए, तो और भी बड़े समाजसेवी बन जाते हैं और अगर मंत्री बन गए, फिर तो पूछना ही क्या. हर काम जनहित में करने के दावे करते हैं. आजतक आपको जनहित के नाम पर चल रहे राजनीति और समाजसेवा के गोरखधंधे का एक नायाब नमूना बतायगा.
आजतक द्वारा की गई पड़ताल की परतें जब उतरेंगी तो एक ऐसा सच आपके सामने होगा जो आपको जितना हैरान करेगा उससे ज्यादा परेशान. दिल्ली से लेकर फर्रुखाबाद तक और लखनऊ से लेकर मैनपुरी तक तेरह जिलों में फैली ये पड़ताल आपको अन्याय के एक अंधे युग में ले जाएगी और मिले हम कलम के उन कलाकारों से भी जिनके जादुई हाथों ने अपराध के ऐसे अफसाने लिख डाले जिनपर पत्थरों की आंखें भी नम हो आए.

एक ऐसे अंधेर का चीखता हुआ सच जिसकी जद में है कांग्रेस का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा. एक ऐसा ताकतवर मंत्री जिसकी मुट्ठी में है देश के कानून की रहनुमाई. मनमोहन सिंह सरकार के उस रसूखदार मंत्री का नाम है सलमान खुर्शीद. देखिए जाकिर हुसैन ट्रस्ट की कारगुजारियों का किस्सा. और देखिए कि तकदीर से हारे लोगों का कैसे मारा गया हिस्सा.

जी हां, देश के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का ट्रस्ट. जो उनके नाना और देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर जाकिर हुसैन की याद में बना था, वो विकलांग कल्याण के नाम पर सरकारी ग्रांट हड़पने के लिए जालसाजी में लिप्त है. आजतक ने जब इस सनसनीखेज खुलासे की पड़ताल शुरू की, तो कैसी-कैसी हकीकत सामने आई. वो पूरा ब्यौरा हम आपको सिलसिलेवार बताएंगे.
कैसे बेनकाब हुई मंत्री जी के ट्रस्ट की कारस्तानी..

देश के महान राष्ट्रपति रहे ज़ाकिर हुसैन के नाम पर चलने वाला एक ट्रस्ट.
नामः जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट.
मुख्यालयः 4, गुलमोहर एवेन्यू. जामिया नगर.
नई दिल्ली 110025.

ये पता भारत सरकार के ताकतवर कैबिनेट मंत्री सलमान खुर्शीद का है. देश के कानून और न्याय मंत्री सलमान खुर्शीद. सलमान खुर्शीद खुद जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं और उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद प्रोजेक्ट डायरेक्टर.

12 जनवरी 2012 को लिखी गई उत्तर प्रदेश सरकार की एक चिट्ठी से गड़बड़झाला सामने आया. ये चिट्ठी नहीं है जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट का चिट्ठा है. इसके मुताबिक अफसरों के जाली दस्तखत किए गए जाली सील-मोहरों का इस्तेमाल हुआ और डकार लिए गए लाखों रुपए. ये रुपए भारत सरकार ने विकलांगों की बेहतरी के लिए दिल्ली से भेजे थे.

कैसे खेला गया जालसाजी का ये खेल

दो चार हजार रुपए नहीं पूरे 71 लाख रुपए के वारे-न्यारे हुए और अब ट्रस्ट के ट्रस्टी हिसाब देने से भाग रहे हैं. 2010 में भारत सरकार के सामाजिक न्याय और सहकारिता मंत्रालय ने सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट को 71 लाख 50 हजार रुपए दिए थे. ट्रस्ट को उत्तर प्रदेश के 17 जिलों में विकलांगों को सहायता उपकरण देने थे. चलने-फिरने में बेबस महसूस करने वालों को तिपहिये दिये जाने थे तो कम सुनाई देने वालों को हियरिंग एड.

तरीका तो ये था कि इसके लिए पहली डीएम को बताया जाता, जिले के कल्याण अधिकारी अपनी सूची भेजते, शिविर लगाया जाता, चीफ मेडिकल ऑफिसर शिविर में मौजूद होते और जिसे वो कहते उसे जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट तिपहिया या हियरिंग एड देता. लेकिन जब आजतक की टीम इसकी सच्चाई जानने लगी तो यह हकीकत हाथ लगी.

फर्रुखाबाद के जिला कल्याण अधिकारी राम अनुराग वर्मा ने दावा किया कि उन्हें जाकिर हुसैन ट्रस्ट की जानकारी नहीं है. उन्हें पैसे के हिसाब-किताब का कोई अता-पता नहीं. पढा़ आपने ? फर्रुखाबाद के जिला कल्याण अधिकारी क्या कह रहे हैं? लेकिन सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद के हस्ताक्षर से जारी हुई चिट्ठी के मुताबिक शिविर भी लगे, उपकरण भी बंटे और अफसरों को इसकी इत्तिला भी दी गई. लेकिन जालसाजी का ये जाल सलमान खुर्शीद के शहर तक ही नहीं फैला था.

मैनपुरी के विकलांग कल्याण अधिकारी तपस्वी लाल ने कहा, ट्रस्ट के कैंप की जानकारी हमें नहीं मिलती. फर्जी दस्तावेजों से कागजों पर भी लगते हैं कैंप. मेरे जाली दस्तखत से दिखाए फर्जी कैंप.

तपस्वी लाल को खबर तक नहीं और उनके नाम से चिट्ठी बनाकर दिल्ली तक पहुंचा दी गई. सील-ठप्पे के साथ. अब जरा तपस्वी लाल के असली दस्तखत के साथ कागज पर किए गए दस्तखत मिलाया गया जो जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट की चेक लिस्ट पर की गई है. सब कुछ साफ-साफ हो गया.

डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन ट्रस्ट के विकलांग कल्याण शिविरों में गड़बड़झाला है, इसकी भनक केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को मई 2011 में ही लग चुकी थी. लेकिन, सब कुछ जानते हुए भी किसी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वो ट्रस्ट के खिलाफ कोई कार्रवाई कर पाता.

अफसरों की बेबसी खुफिया कैमरे पर बयान हुई. बड़े-बड़े अफसरों के फर्जी दस्तखत और मुहर लगाकर कागजों में कैंप लगाए गए, बेनामी लाभार्थियों की लिस्ट बनाई गई. पूरा सिस्टम धृतराष्ट्र की तरह इस गड़बड़ घोटाले से अनजान बना रहा.

कैसे पकड़ में आई धांधली

सलमान खुर्शीद की पत्नी लुई खुर्शीद की निगरानी में जाकिर हुसैन ट्रस्ट समाजसेवा पर लाखों रुपए खुले हाथ लुटा रहा था और समाज को इसकी हवा तक नहीं थी. हमने पता किया तो पता चला दिल्ली को इसकी पूरी खबर है.

भारत के सामाजिक न्याय मंत्रालय को शक हुआ कि सलमान खुर्शीद का ट्रस्ट घपला कर रहा है. मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को चिट्ठी लिखी. इस चिट्टी में 17 जिलों में ट्रस्ट के खिलाफ जांच के निर्देश थे. सामाजिक न्याय मंत्रालय के अंडर सेक्रेट्री आरपी पुरी से मिलिए. इन्हें सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट में चल रहे घपले का शक तो बहुत पहले से था लेकिन कार्रवाई का साहस आजतक नहीं जुटा पाए हैं.

3 महीने बाद यानि 5 अगस्त 2011 को यूपी सरकार ने उन सभी 17 जिलों के डीएम और कल्याण अधिकारियों से रिपोर्ट तलब की जहां-जहां सलमान खुर्शीद का ट्रस्ट सेवा का मेवा खा रहा था. हर जगह एक ही नाम, पद और मुहर. लुई खुर्शीदस, प्रोजक्ट डायरेक्टर, डॉ. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट.

जांच की रिपोर्ट बताती है कि सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट ने केवल जाली चिट्ठियां बनाई थी, जाली पद भी बना डाले थे.

जब जिलों से जांच की रिपोर्ट आने लगी को सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट की कलई उतरने लगी. पता चला कि लाभार्थियों को मदद मिली या नहीं इसकी तस्दीक करने वाली सरकारी टेस्ट रिपोर्ट में जमकर कलाकारी की गई थी. इटावा से आई रिपोर्ट में सीएमओ के दस्तखत जाली निकले. बुलंदशहर से रिपोर्ट आई कि विकलांग कल्याण अधिकारी का दस्तखत भी फर्जी है और मुहर भी. और तो और बुलंदशहर में जिस चिकित्सा अधीक्षक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का ज़िक्र है वो वजूद में ही नहीं है. सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट ने शाहजहांपुर में फर्जी ब्लॉक ही बना डाला.

पता चला कि न कैंप लगे, न उपकरण बंटे और न कोई रिपोर्ट बंनी लेकिन देश के सामाजिक न्याय मंत्रालय को बताया गया कि सबकुछ ओके है.

देश के न्याय मंत्री के ट्रस्ट के अन्याय पर नीचे से ऊपर तक चुप्पी है. मान सब रहे हैं कि सलमान खुर्शीद का ज़ाकिर हुसैन ट्रस्ट जालसाज़ी की पूरी किताब है. लेकिन इस किताब पर पाबंदी लगाने की पहल कोई नहीं कर रहा. आप चाहें तो इसे मजाक मानें और चाहें तो मजबूरी.

सरकारी अफसरों की बातों और सरकारी दस्तावेज़ों से साफ है कि जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट समाजसेवा के नाम पर जालसाजी कर रहा था. बेबस, गरीब लोगों का हक मार रहा था. ये तस्वीर और साफ हुई, जब आजतक की टीम ने उन लोगों को ढूंढना शुरू किया, जिनके नाम पर सरकारी ग्रांट का गोलमाल हो रहा था.

2010 में सलमान खुर्शीद और लुई खुर्शीद के जाकिर हुसैन ट्रस्ट में 71 लाख रुपए का बंदरबांट हुआ और अगले ही साल 2011 में उसे 68 लाख रुपए फिर दे दिए गए. इस ट्रस्ट पर सरकारी की इतनी मेहरबानियों की वजह तो अबतक आप भी समझ चुके होंगे. लेकिन सवाल है कि जब सजा दिलाने वाले सूरमाओं पर ही गुनाह के आरोप लगने लगें तो फरियादी उम्मीद भी बांधे तो किन दरवाज़ों से.

http://aajtak.intoday.in/story.php/content/view/710043/salman-khurshids-trust-under-scanner-for-misappropriation-of-fund.html

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