"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

गुरु गोबिंद सिंह


गुरु गोबिन्द सिंह ( जन्म: २२ दिसंबर १६६६, मृत्यु: ७ अक्टूबर १७०८) सिखों के दसवें गुरु थे। उनका जन्म बिहार के पटना शहर में हुआ था । उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त ११ नवम्बर सन १६७५ को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों ( जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ १४ युद्ध लड़े।

गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया और इसे ही सिखों को शाश्वत गुरू घोषित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। सिखों के दस गुरु हैं ।

उस समय औरंगजेब बादशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा हुआ था। हिंदू धर्म की रक्षा के लिए जिस महान पुरुष ने अपने शीष की कुरबानी दी, ऐसे सिक्खों के नवें गुरु गुरु तेग बहादुर जी के घर में सिक्खों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी का परकाश् हुआ था। उन दिनों गुरु तेग बहादुर जी पटना (बिहार) में रहते थे।

पटना साहिब

22 दिसंबर, सन् 1666 को गुरु तेग बहादुर की धर्मपरायण पत्नी गूजरी देवी ने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया, जो बाद में गुरु गोबिंद सिंह के नाम से विख्यात हुआ। बालक के जन्म पर पूरे नगर में उत्सव मनाया गया। उन दिनों गुरु तेग बहादुर असम-बंगाल में गुरु नानक देव जी के संदेश का प्रचार-प्रसार करते हुए घूम रहे थे।



हिन्दुओ के महान गुरु गोबिंद सिंह जी की कुरबानी समस्त सनात्म्धर्मि कभी नही भूल पाएंगे, जब औरंगजेब जैसा जालिम बादशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा हुआ था। उसके आतंक से लोगों को राहत देने के लिए तथा हिंदू धर्म की रक्षा के लिए इन महान पुरुषो ने कुरबानी दी और उन्होने कहा कि अपना धर्म नही छोडेंगे चाहे जान देनी पडे जब गोविंद आठ- नौ साल के थे तब गुरु तेगबहादुर का प्रभाव उन दिनों काफ़ी बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर औरंगज़ेब हिंदुओं पर कहर बरपा रहा था और उन्हे जबरदस्ती इस्लाम कबूल करने के लिए अत्याचार कर रहा था । कुछ कश्मीरी पंडित तेगबहादुर की शरण में औरंगज़ेब से बचने के लिए आनंदपुर साहिब आये। तेगबहादुर औरंगज़ेब से इस विषय में बातचीत करने के लिए दिल्ली पहुँचे लेकिन औरंगज़ेब ने उन्हें गिरफ़्तार करवा लिया। औरंगज़ेब ने उनसे कहा, तेग बहादुर, अब तुम मेरे रहमो-करम पर हो। अगर तुम सच्चे संत हो तो हमें कोई चमत्कार करके दिखाओ, वरना अपना ईमान छोड़ दो। गुरु तेग बहादुर ने कहा, मेरी गर्दन में एक ताबीज़ बंधा है जिसके कारण तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। यह सुनते ही गुरु तेगबहादुर का सिर औरंगज़ेब के इशारे पर काट दिया गया। यह घटना 11 नवम्बर 1675 ई. में दिल्ली के चाँदनी चौक में हुई थी। जब तेगबहादुर जी की गर्दन में बंधा ताबीज़ खोलकर देखा गया तो उसमे लिखा था – मैंने अपना सिर दे दिया, धर्म नहीं।

“जिनको आन प्यारी थी वो बलिदान हो गए जिनको जान प्यारी थी वो मुस्लमान हो गए”

गुरु गोबिंद सिंह ( 22 दिसंबर 1666 – 7 अक्टूबर 1708 ) सिख धर्म के दसवें गुरु थे. वह सिख धर्म, एक योद्धा, एक कवि , और एक दार्शनिक नेता थे. गुरु गोबिंद सिंह मर्दानगी का एक आदर्श उदाहरण माना जाता है जो उच्च शिक्षित, घुड़सवारी में कुशल, सशस्त्र मुकाबला, सरदार, और चरित्र में उदार थे.

2 responses

  1. Sinners will not recognise but true hindu will always… No need to worry dear because truth can hide but not erased.

    January 29, 2013 at 7:09 PM

  2. Really, very few people try to recognise this side of sikh history and thier assosiation with hindus against the oppressive mughal empire.

    January 29, 2013 at 7:04 PM

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