"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

स्पेशल 26 का मूवी रिव्यू


19 मार्च 1987 को मुंबई के ओपेरा हाउस चौराहे पर शहर की सबसे बड़ी जूलरी शॉप पर 26 लोगों की एक टीम ने अचानक छापा मारा और लाखों रुपयों की जूलरी ले गए। हर किसी को यही लगा था कि सीबीआई की टीम ने छापा मारा है। हड़कंप उस वक्त मचा जब पता चला कि छापा मारने वाली टीम का सीबीआई से कुछ लेना देना नहीं है। डायरेक्टर नीरज पांडे ने इस सब्जेक्ट पर काम शुरू किया। आखिरी 20 मिनट की फिल्म हर सीन पर करवट बदलती है।

कहानी: अजय कुमार (अक्षय कुमार) जब सीबीआई में भर्ती नहीं हो पाता तो सीबीआई की एक ऐसी नकली टीम तैयार करता है, जिसके निशाने पर भ्रष्ट मंत्री और काली कमाई करने वालों के अलावा ऐसे बिजनेसमैन भी हैं जो काली कमाई करते हैं। अजय की स्पेशल टीम में 8 बच्चों का बाप पंजाबी शर्मा जी (अनुपम खेर), इकबाल (किशोर कदम) और जोगेंद्र (राजेश शर्मा) शामिल हैं। फिल्म की शुरुआत होती है दिल्ली से, जहां अजय की यह टीम एक भ्रष्ट मिनिस्टर के घर पर लोकल पुलिस की मदद से छापा डालती है। अजय तुगलक रोड थाने के सबइंस्पेक्टर रणबीर सिंह (जिमी शेरगिल) को फोन करके सफदरजंग चौराहे पर बुलाता है। लेडी पुलिस कॉन्स्टेबल (दिव्या दत्ता) और सिपाहियों के साथ रणबीर भी अजय की टीम के साथ मिनिस्टर के घर पहुंचते हैं। सीबीआई की यह नकली टीम मिनिस्टर के घर के हर कोने में छिपे नोटों के बंडल बरामद करती है। जूलरी और नोटों के बंडलों को सूटकेस में भरकर सीबीआई की यह टीम मिनिस्टर साहब के घर से निकलती है और रणबीर और उसकी टीम मिनिस्टर साहब के घर जमी रहती है।

थोड़ी देर बाद रणबीर सिंह को पता चलता है कि सीबीआई ने मिनिस्टर के घर छापा मारा ही नहीं और मिनिस्टर साहब करोड़ों का चूना लगने के बावजूद पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने को तैयार नहीं। रणबीर और लेडी कॉन्स्टेबल को सस्पेंड कर दिया जाता है। अब रणबीर का एक ही मकसद बचा है इस टीम के सदस्यों का पता लगाकर अपनी बेगुनाही साबित करना। रणबीर के हाथ कुछ सबूत लगते हैं तो वह असली सीबीआई के पास पहुंचता है। तेजतर्रार सीबीआई इंस्पेक्टर वसीम खान (मनोज) को इस केस की जिम्मेदारी दी जाती है, जिसकी मदद के लिए रणबीर साथ है।

ऐक्टिंग: अक्षय के करियर के लिए यह फिल्म यू टर्न है। अजय का किरदार अक्षय की पिछली इमेज से बिल्कुल हटकर है। अक्षय ने इस किरदार को अपने सशक्त अभिनय से जीवंत कर दिया है। वसीम खान के किरदार में मनोज ने दर्शकों की हर क्लास की खूब वाहवाही बटोरी। अनुपम खेर, राजेश शर्मा, दीप राज अपनी भूमिकाओं में फिट हैं। छोटी सी भूमिका के बावजूद दिव्या अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहीं। काजल बस अक्षय की हीरोइन की खानापूर्ति करने के लिए हैं।

डायरेक्शन: नीरज पांडे ने स्क्रिप्ट और किरदारों पर मेहनत की है। कहानी का छोटा-सा किरदार भी अपनी अहमियत दर्ज कराता है। शुरुआत से आखिर तक नीरज की स्क्रिप्ट और किरदारों पर पूरी पकड़ है। न जाने क्यों इस बार उन्होंने फिल्म में गानों को ठूंसने का फैसला किया जो कहानी की तेज रफ्तार को कम करते हैं।

संगीत: हिमेश का संगीत बस ठीक-ठाक है। अक्षय का गाया ‘मुझ में तू’ का फिल्मांकन अच्छा है। चूंकि कहानी में गानों की गुंजाइश नहीं थी, यही वजह है दर्शक इन से कहीं बंध नहीं पाता।

क्यों देखें: बेहतरीन स्क्रिप्ट, मजेदार क्लाइमेक्स, अक्षय का बदला-बदला लुक। ‘ए वेडनसडे’ के बाद नीरज की एक और दमदार फिल्म जो आपकी कसौटी पर खरा उतरने का दम रखती है।

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