"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

समाज को बदलने की जरूरत है


आज सुबह ही यह पंक्तियां पढ़ीं- एक कुतिया रात में रास्ते से जा रही थी। राह में सामने से पांच-छह कुत्ते आते दिखे। कुतिया घबरा गई। इस पर कुत्तों ने कहा -‘आप डरें नहीं, आराम से जाइए। हम कुत्ते हैं, भारतीय मर्द नहीं।’ यह तो रहा वास्तविकता पर एक सामयिक कॉमेन्ट, लेकिन फिर आंखों के आगे सचाई आ जाती है कि अब लफ्फाजी और लच्छेदार भाषा से काम नहीं चलेगा। अब समय है ऐक्ट का। यह सब लिखना और बातें करना बेईमानी होगा अगर हम समस्या की जड़ तक न जाएं, उसे सबके सामने न लाएं। यह भावना में बहने और अधिक ‘लाइक’ पाने का समय नहीं है। बात वो की जाए जो प्रैक्टिकल हो। कानून के दायरे में हो, संविधान द्वारा अनुमोदित हो। लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? कतई नहीं.

भारत ही एक ऐसा देश है जहां हर छह महीने में देवियों का पर्व मनाकर हम बेटियों को पूजते हैं। उसी देश में विश्व की सबसे अधिक बाल वैश्याएं हैं। यह अब सीता, रुक्मणी ,गार्गी, जीजाबाई या लक्ष्मीबाई का देश नहीं, यह देश अब ‘नच बलिये’ का देश है। यहां गायत्री मंत्र नहीं बल्कि गूंजता है ‘शीला की जवानी’। आज गली-गली में मां बनने से बचने और कोख में बच्चे को मारने का सामान बिक रहा है। केंद्र सरकार का एक मंत्री- ‘बीवी जब पुरानी हो जाती है तब उसमें वह मजा नहीं रहता’ जैसा बयान देने के बाद भी पद पर बना रहता है। पुलिस कमिश्नर सलाह देता है कि लड़कियां अपने साथ मिर्ची पाउडर लेकर चलें.

सचाई और वास्तविकता में कितना जमीन और आसमान का अंतर है इसे इस एक उदाहरण से ही समझा जा सकता है… और मैं फांसी की सजा की मांग करने वालों को बता दूं कि अभी कुछ महीने पहले ही भारत की ही एक महिला राष्ट्रपति ने गैंगरेप के आरोप में फांसी पर लटकाने की सजा से दंडित किए जा चुके चार मामले के दोषियों पर रहम कर दिया। इसकी बदौलत अब वे फांसी पर लटकाए जाने के बदले कुछ सालों ‘जन्मकैद’ की सजा काटकर फिर आ जाएंगे बाहर। कोई ऐसी रहम की अपील के खिलाफ क्यों आवाज नहीं उठाता?

गैंगरेप के राष्ट्रीय शर्म पर जहां समय ऐक्ट करने का है, वहां दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में नाम पाकर पुलकित होने वाली कांग्रेस अध्यक्ष जो इस समय ऐक्ट करने की सबसे बड़ी शक्ति रखती हैं, वह शीला दीक्षित और सुशील कुमार शिंदे को चिट्ठी लिख रही हैं। अरे, किसकी आंख में धूल झोंकी जा रही है? ….ये पब्लिक है सब जानती है

सरकार और प्रशासन को वह कदम उठाने चाहिए जो प्रैक्टिकल हों, फुलप्रूफ हों और परिणामोन्मुख हों। आज देश में कानून इसलिए मजाक बना है, क्योंकि उसे कभी पूरा लागू ही नहीं किया जाता। बहुत से तो ऐसे हैं जिनका खुले आम मजाक बनाया जा रहा है। ट्रैफिक कानून का ही एक उदाहरण ले लें, सौ में से 90 नियम ऐसे हैं जिन्हें लागू करने के लिए ट्रैफिक पुलिस ने ही कभी जोर नहीं दिया। अगर ऐसा किया तो फिर मुठ्ठी कैसे गर्म होगी?

यह भी सही है कि महिला अत्याचारियों की पूरी जानकारी नामसहित वेबसाइट पर लोड की जाए। जब तक दोषियों के नाम उजागर नहीं होते तब तक वे इसे दोहराते रहेंगे। बलात्कारियों, दहेज प्रेमियों को जनता के बीच बदनाम करने से समाज को फायदा ही होगा। कमिटी ने विज्ञापनों और प्रोमो में महिला देह प्रदर्शन को भी उतना ही दोषी माना है। साथ ही दिल्ली रेप पीड़िता को घंटों तक सडक़ पर पड़ी देखकर गुजर जानेवाले उन हजारों नागरिकों को भी दंडित किए जाने की बात कही है। कहा है -‘जुल्म होते देखकर उसकी खबर न करना भी एक बहुत बड़ा अपराध है और इससे अपराधियों को शह ही मिलती है। अपराध होते देखकर मूक दर्शक बननेवाले वास्तव में सहअपराधी की श्रेणी में आते हैं।’ वैसे भी भारतीय संविधान की धारा 39 में साफ लिखा है कि महिलाओं की रक्षा हर भारतीय की ड्यूटी है। साथ ही दंडसंहिता 177 और 202 के अंतर्गत मूक रहना दंडनीय अपराध माना गया है। रिपोर्ट में एकपक्षीय तलाक कानून पर पुनर्विचार करने की जरूरत बताते हुए राजनीतिक पार्टियों से अपेक्षा की गई है कि वे महिलाओं के खिलाफ अपराध करनेवालों को टिकट न दें और पीछा करने व ब्लैकमेल करने को भी गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाए

दिल्ली गैंगरेप के बाद महिलाओं के खिलाफ हो रहे अन्याय रोकने के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा गठित धर्माधिकारी कमिटी ने जो सिफारिशें की हैं वे बिल्कुल व्यावहारिक हैं और फौरन लागू करने लायक हैं। यह बिल्कुल सही है कि फेसबुक, मोबाइल फोन, अश्लील चैट और न्यूड फोटो के आदान प्रदान ने पूरी पीढ़ी को दिग्भ्रमित कर दिया है। वे आधा अधूरा ज्ञान पाकर अपने आप को पीएचडी मान बैठे हैं। यहीं पर जब उनका सामना दुनिया की सचाई से होता है तो अपने आप को औंधे मुंह गिरा पाते हैं.

आज महिलाओं के खिलाफ हर ओर रहे अत्याचार और भेदभाव पर आचार्य देवप्रभाकर शास्त्री की ये ‘हनुमान व्यथा’ के संदर्भ में कही पंक्तियां मौजूं लगती हैं:

‘किस रावण की बाहें काटूं, किस लंका में आग लगाऊं।
घर-घर रावण, पग-पग लंका, इतने राम कहां से लाऊं।।

हम यूं तो दहेज समस्या पर लाखों नारे लगाते हैं, लेकिन स्टेज बदलते ही वही सास-ससुर बेटे की शादी आते ही रोल बदल लेते हैं। क्या दहेजलोभी किसी और ग्रह से आते हैं? क्या दहेजलोभियों की बेटी नहीं होती? वे इसी समाज के अहम हिस्से हैं जो समय बदलते ही अपना मुखौटा उतारकर शोषित से शोषक बन जाते हैं। हमें अगर जागरुकता बढ़ानी है तो इस दिशा में करें। यही अंतहीन सिलसिला सारी समस्या की जड़ है.

कन्या भ्रूणहत्या को रोकने की जितनी कोशिश हो रही है, मामला उतना ही गंभीर होता जा रहा है। एक से एक लुभावने नारे दिए जा रहें हैं जो सीधे ही लोगों के सिर के ऊपर से ही निकल जा रहे हैं। गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन कोई बहुत पुराना नहीं है। यह ट्रेंड देश में करीब दो तीन दशक पहले आया, जब भारत में पहली बार ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ आई। वैज्ञानिकों ने इसका आविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे के रोग, विकार और विकलांगता की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। अस्पतालों में भी इसी इरादे से मशीनें लगीं, लेकिन जल्दी ही हम शॉर्टकट प्रेमी भारतीयों ने इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराने के लिए शुरू कर दिया। यहीं से कन्याभ्रूणहत्या के फैशन की इब्तिदा हुई। तब से शुरू हुए इस सिलसिले ने पूरे समाज में लिंग अनुपात की स्थिति बिगाड़ दी। भारत में तो स्त्री जन्म से पहले से ही दहशत में जीती है? उसे तो जन्म लेने के पहले ही मार दिया जाता है। यदि जन्म ले भी लेती है तो उसके बाद भी उपेक्षा, भेदभाव और दहेज के लिए मार दिया जाता है

निर्भया गैंगरेप के बाद बढ़ी जागरुकता निस्संदेह प्रशंसनीय है। सरकारी कदमों का बढ़ना बेहतरीन है, लेकिन इसी रफ्तार में हम इतनी लफ्फाजी करने लगे हैं कि विषय की गंभीरता खत्म होने लगी है। अजीब-अजीब सुझाव आ रहे हैं- कि सास अपनी बहू को बेटी समझे, कि बहू अपने सास-ससुर को माता-पिता माने, कि बेटी बचाना इसलिए जरूरी है कि तभी तो वह बहू बनकर दूसरे का वंश बढ़ाएगी, कि बेटी मां नहीं बनेगी तो बहू कहां से लाएंगे? क्या लोग इतने उदारमना हो गए हैं कि दूसरे के घर की बहू और बेटे को मां की दरकार पूरी करने के लिए उसका पालन पोषण करेंगे? यह कैसे संभव हो सकता है जिस मां- बाप ने उन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया और सिर्फ निस्वार्थ प्यार दिया, उसके समकक्ष कैसे एक ही रात में अपने सास-ससुर को बैठा दे? अजी, सचाई के धरातल पर खडे़ होकर पहले बेटी को दुनिया में आने तो दो। बेटी को बेटी तो समझो, बेटी होने का उसे हक दो, तो माने। झूठे ही बक-बक और फर्ज अदायगी से कुछ नहीं होनेवाला.

महिला दिवस पर सर्वाधिक औपचारिक भाषण सुनने को मिलते हैं। ‘नारी सम्मान’ से शुरू होनेवाला सिलसिला इसी बृहद विषय पर आकर अटक जाता है जो शायद सारे एनजीओ, सामाजिक कार्यकर्ता और संगठनों का सबसे पसंदीदा है। हम भारतीय किसी भी वस्तु की अति करने के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं। समस्या हो या समाधान, दोनों की परिधि छूना हमारी परंपरा रही है। पहले तो हम समस्या से ऐसे गाफिल रहेंगे कि मानो उसका अस्तित्व ही नहीं है और जब उसकी तीव्र सचाई सामने आती है तो उसी पैमाने पर ओवररिएक्ट करने लगते हैं। आइंस्टीन सच कहते थे कि लोग सीधी चीज को भी सीधी तरह नहीं देखते और इसी से सारी कठिनाइयां शुरू होती है। स्त्रियों को लेकर तो और भी सीधे ढंग से नहीं सोचा जाता। महिला सम्मान, कन्या भ्रूणहत्या और दहेज समस्या ये तीन ऐसे विषय हैं जिनके बगैर महिला दिवस पर सारी चर्चा बेमानी है। हम, आप और सरकार सचमुच में कुछ करना चाहते हैं तो सबकुछ एकतरफ रख इन्हीं तीनों मसलों को सुलझाने में सारी एनर्जी झोंक देनी चाहिए.

By: Tyagi Raj Anurag Tyagi

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