"Everybody is a genius. But if you judge a fish by its ability to climb a tree, it will live its whole life believing that it is stupid." – Albert Einstein

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ए कैसा लोकतंत्र है?


सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे

छोडो मेहँदी खडक संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे |

कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो दुशासन दरबारों से
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयेंगे |

कल तक केवल अँधा राजा,अब गूंगा बहरा भी है
होठ सील दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है
तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे, किसको क्या समझायेंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे |

मैं मरी नहीं, मुझे मौत पर दया आ गई कि कबसे दरवाजे पर खड़ी थी, पर मैं लड़ी थी और अब हजारों आवाजों में जिंदा हूं, मैं मुल्क हो गई हूं!

"दामिनी की दुखद मॉत" देश को हिला देने वाली घटना से, "पूरा देश इस्तब्ध" रह गया है! "देश में शासन" करने वाली "सरकार" जब जनता के "जानमाल की सुरक्षा" नहीं कर सकती तो उसे "देश में वेकल्पिक विवसथा", को शासन सौप देना चाहिये, सत्ता में रहने का अब कोई " नैतिक अधिकार नहीं" रह गया है, "सरकार" तो अपनी तानाशाही से अंग्रेज़ों की नीतिओं का ही अनुसरण कर रही है, लेकिन विपक्ष (Opposition) की भूमिका भी कम संदिग्ध नहीं कही जा सकती!

यदि ये जनता की आवाज नहीं उठा सकते तो राजनीति करना छोड दें आँर राजनीति से सन्यास ले ही लें "विरोध के लिये विरोध की राजनीति" खतम् करना बंद करें, जनता अब ज्यादा बर्दास्त करने की स्थिति में नहीं है!

पहाड़ टूटता है सिर पर नहीं दिल पर पत्थर रखे जाते हैं, आज तुम चली गयी ,खून के आंसू कैसे होते हैं जब सारा जहाँ रोता है आंसुओं का सैलाब आ जाता है !